आखिर कब तक ?

आखिर कब तक ?
आखिर कब तक चुप बैठते ?
भरे बादल ने तो गरजना ही था ,
आखिर कब तक खुद ही को रोकते ?
नए रास्ते की खोज में तो निकलना ही था 
हम हैं कॉलेज ऑफ़ आर्ट , हम भी हैं ऍफ़ टी आई आई,
हम हैं इस देश का आज ,
और हम ही हैं
वोह आने वाला कल,
जिसमें लाएंगे हम,
सोचने , बोलने , उम्मीदों की आज़ादी
जिसमें ला रहे हैं हम ,
अपने हक़ को जीने ,
अपने हक़ को पनपते देखने की आज़ादी
हम अकेले तो नहीं , हमारा सच है हमारे साथ ,
हम अकेले तो नहीं , हमारी कला है हमारे पास
यूँ न सोचियेगा , कि थक जाएंगे हम ,
यूँ न सोचियेगा , कि थम जाएंगे हम ,
यह तो समुन्दर की नाराज़गी है जनाब , भला ऐसे ही टाल देंगे आप ?
यह तो रूठी हुई तेज़ हवाएं हैं , मौक़ा है , सुन लीजिये आप
बस एक छोटी सी दरख्वास्त है , हमारा हक़ हमें दे दें ,
बस एक छोटी सी दरख्वास्त है ,हमारा आज अपनी सोच से ऊपर उड़ने दें 

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फिर धूप किनारे

फिर एक दिन ढला
फिर एक रात जगी
उन दोनों के दरमियान
फिर एक शाम खिली
इस धूप किनारे के कुछ पल
जो दिन की लहरों से आये थे
बिन बोले सब जान गए
जो मन में बादल ढाए थे
जब शाम खिली तो मन फिसला
क्यों रात का साया आता है ?
नीला समुन्दर भी कुछ ठहरा
फिर यूँ सोच के बहता जाता है
कि इस धूप किनारे के यह कुछ पल
जो दिन की लहरों से आये थे
यह रहगुज़र हैं
चांदनी के
कल फिर उसी ओर से आएंगे

-पूर्णिमा

एक रात की एक बात

If there is something I am learning to empathize with, is the conflict deep within.

In my last poem, I expressed fear of darkness, here I embrace the night.

अगर रात में सोना ही था
तो रात इतनी खूबसूरत है क्यों
आसमान में जगमगाती इस इनायत के लिए तो पूरा दिन गुज़ारा है
अगर रात में सोना ही था
तो भला दिन में जागे ही क्यों

Thesis on Museums in India

Mixed Pakodas

For the last one month I have struggled to decide upon the topic and core questions for my thesis on museums in India. The only certainty I have had in this chaos is that there are definitely a lot of models of community engagement, living heritage and representation of multiple identities that could be found within India, though not necessarily within museums. So are collaborative projects in placemaking, in offering democratized spaces for dialogue for different stakeholders, or at least attempting at that.

My knowledge is limited, and I feel I am delving into something much deeper than I had anticipated. To make sense of the chaos, I would be sharing some thoughts and ideas as I work on my thesis in the following posts.

If you would like to discuss on this, feel free to comment here or e-mail at ps2913@nyu.edu with subject line- “Museums in India”

I would much…

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