आखिर कब तक ?

आखिर कब तक ?
आखिर कब तक चुप बैठते ?
भरे बादल ने तो गरजना ही था ,
आखिर कब तक खुद ही को रोकते ?
नए रास्ते की खोज में तो निकलना ही था 
हम हैं कॉलेज ऑफ़ आर्ट , हम भी हैं ऍफ़ टी आई आई,
हम हैं इस देश का आज ,
और हम ही हैं
वोह आने वाला कल,
जिसमें लाएंगे हम,
सोचने , बोलने , उम्मीदों की आज़ादी
जिसमें ला रहे हैं हम ,
अपने हक़ को जीने ,
अपने हक़ को पनपते देखने की आज़ादी
हम अकेले तो नहीं , हमारा सच है हमारे साथ ,
हम अकेले तो नहीं , हमारी कला है हमारे पास
यूँ न सोचियेगा , कि थक जाएंगे हम ,
यूँ न सोचियेगा , कि थम जाएंगे हम ,
यह तो समुन्दर की नाराज़गी है जनाब , भला ऐसे ही टाल देंगे आप ?
यह तो रूठी हुई तेज़ हवाएं हैं , मौक़ा है , सुन लीजिये आप
बस एक छोटी सी दरख्वास्त है , हमारा हक़ हमें दे दें ,
बस एक छोटी सी दरख्वास्त है ,हमारा आज अपनी सोच से ऊपर उड़ने दें 

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About poornimasardana

Travel and Observations acquaint me with the Existent Pluralities around us and I wish to share those. I indulge in narratives (illustrations, words and pictures), it being my most cherished pursuit.
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